बिन मौसम बादलों को गरज़ते हुए देखा है
बरसात के लिए मोर् को तरसते हुए देखा है
अपना दुःख तुम्हारी आँखों से बरसते हुए देखा है
मुझसे क्या छुपाना चाहते हो मेरे दोस्त,
मैंने तो तुम्हारी मुस्कराहट को भी सिसकते हुए देखा है l
बरसात के लिए मोर् को तरसते हुए देखा है
अपना दुःख तुम्हारी आँखों से बरसते हुए देखा है
मुझसे क्या छुपाना चाहते हो मेरे दोस्त,
मैंने तो तुम्हारी मुस्कराहट को भी सिसकते हुए देखा है l
भावनायों से भरा.
ReplyDeleteAwesome poem.
SUPER....
ReplyDeleteThank you :)
ReplyDeleteI can feel d words.!! Very ddeep thoughts .!! U r quite gud.!! Very impressive :)
ReplyDeleteThankyou :)
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