थक के रुकी हूँ,
या रुक -२ के थकी हूँ
गुस्से में अपने,
कई बार फुकी हूँ
चलो छोड़ो, जाने दो अब मुझे,
अपने मन का कर आने दो मुझे
क्या फर्क पढ़ता है,
गर मैं खोयी सी रहूँ
जागे हुए भी सोयी सी रहूँ
नहीं मानूंगी, नख़रे दिखाउंगी
मनाओगे तो भी वापस न आउंगी
हाँ मैं थोड़ी ज़िद्दी हूँ,
पर इस कला में तुमसे पिद्दी हूँ
खोले चली अपने जज़बातों कि पेटी हूँ,
कह लो सनकी मुझे,
आखिर मैं भी कवि कि बेटी हूँ
:-)
ReplyDelete:)
ReplyDeletenice poem...WELL DONE
ReplyDeletesuper...awsome
ReplyDelete