Thursday, December 20, 2012

ये कलयुग है


इंसानियत कबकि मर चुकी है ,
कल भले ही दुनिया का अंत हो ना हो,
लोगों में आक्रोश, मोर्चों में भीड़ जुट रही है,
कल भले ही उसका असर हो ना हो,

ये आख़िर हो क्या रहा है,
मानवियता से अपना नाता खो क्यूँ रहा है,
ख़ुदा की दी हुई ये ज़िन्दगी कितनी ख़ूबसूरत है,
कर्मों से तोल कर देखो तो कितनी बदसूरत है,

बलात्कार हो रहा है हमारी सोच का ,
अभिमान का स्वाभिमान का,
तन के घाव तो फिर भी भर जाएंगे,
मन के ज़ख़्म कैसे भर पायेंगे,

ये युग कलयुग बन गया है,
हर राम में अब रावण बस गया है,
पल पल मरती इस ज़िन्दगी से हमें बचाओ,
सफ़ेद घोड़े पे सवार हाथ में लिए तलवार,
दुष्टों का सर्वनाश करने कल्की अब आ जाओ...अब तुम आ जाओ 

-mighs

Tuesday, October 9, 2012

प्यासे  खड़े साहिल पर ,

डर है डूब जाने से,

आज वो शख्स क्यूँ याद आ गया,

भुला चुके जिसे ज़माने से, 

 

ना झाँक ले मन में कहीं कोई,

छिप जाए दर्द मेरा मुस्कुराने से ,

क्यूँ खोजने लगे, दबे किताबों में,

पत्ते ग़ुलाब के कुछ पुराने से,


जिस ओर कभी रुख न किया,

आज गुज़रे थे कदम उस मैख़ाने  से,

लौट आए खाली हाथ  छलका के अश्क,

अँखियों  के पैमाने से,

 

हाँ हैं हम थोड़े  नादान कुछ पागल हैं ज़रा दीवाने से।    

-mighs :)

Tuesday, September 25, 2012

किसी ने मुझसे पूछा , तू आजकल कहाँ रहती है ?
भूल गयी या आज भी दोस्तों से मिलने की चाह रहती है ?
क्या ज़वाब दूँ उसे, कि हरदम खिलखिलाने वाली मेरी ज़िन्दगी 
ना जाने आज कल क्यूँ मुझसे उदास रहती है ?

ना किसी बात से ख़ुशी मिलती है न किसी बात का ग़म ,
ना ही कोई मीठी याद करती है अब आँखें नम ,
मन के समंदर में न कोई लहर उठती है ,
ना ही कोई चीज़ अब दिल में घर करती है 


क्या सच में मैं  बदल गयी हूँ ,
या इस मतलबी दुनिया की ठोकरें खा कर संभल गयी हूँ 
जो है जैसी भी राह है बस चलते चले जा रही हूँ,
और मन ही मन किसी का कहा गुनगुना रही हूँ,
सुबह होती है शाम होती है,
ज़िन्दगी यूँ ही  तमाम होती है ...........................:)

-Mighs... :)

Thursday, May 10, 2012

माना मेरी ज़िन्दगी कोई खुली किताब नहीं ,
गर कुछ पन्ने पलट सको तो जाने,

माना उसकी लिखावट में कोई मिठास नहीं,
गर भावों को ज़रा भी समझ सको तो जाने,

ये बिखरी हैं, उलझी हैं, तन्हां हैं,
जो समेट कर फिर जिंदा कर सको तो जाने