मेरा दोस्त
एक कबूतर रोज़ मेरी खिड़की पर आता है,
बैजु़बानं है पर मानो मुझसे कुछ कहना चाहता है।
गूटर् गू़ं कर कर के मुझे बुलाता है,
ना सुनू तो जो़र से पंखः फड़फड़ाता है।
मेरे दिए चावल बडे़ शौक से खाता है,
पर थोडा़ करीब जाऊं तो झट से उड़ जाता है।
धीरे धीरे ही सही पर अब डर कम रहा है एक,
नन्हा सा दोस्त मेरा बन रहा है।
awesomee lines
ReplyDeleteThank you :)
ReplyDeleteNice lines ma'm.......
ReplyDeleteBeautiful poem...
ReplyDelete